हिंदी फिल्मों के गाने : मुक्ति के स्वर

हिंदी फिल्मों के गाने : मुक्ति के स्वर

May 21, 2026

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कहते हैं कि फिल्मी गाने आधुनिक जीवन का लोक संगीत हैं। बीसवीं सदी की एक अद्भुत ईजाद यानी फिल्मों ने हमें फिल्मी गाने दिये हैं। इन फिल्मी गानों ने हमारे दैनंदिन जीवन में काम लाए जाने वाले शब्द दिए हैं। भावनाओं को उजागर करने के लिए सरल वाक्य  दिए हैं। शक्ति और सत्ता से टकराने का हौसला दिया है और कठिनाइयों का हँसकर सामना करना  सिखाया। इनका वुजूद बदलते हुए समाज के साथ ही रूप लेता रहा है और अब भी ले रहा है। कह सकते हैं कि जो काम लोकगीत-मुहावरे और लोकोक्तियां किया करती थीं, वही काम ये गाने पिछले लगभग नब्बे  सालों से कर रहे हैं।

आज से बारह साल पहले, वह एक तूफानी बारिश की शाम थी, जब हम वनराज भाटिया के घर पहुंचे। हमारी तलाश थी उन म्यूजिक अरेंजरों का योगदान जिन्होंने हिंदी फिल्मों के गानों को ख़ास बनाया, फिल्मों के बैकग्राउंड स्कोर रचे और बेशुमार संगीत वादकों को आर्थिक सहारा भी दिया। संगीतकार वनराज भाटिया यूं तो पश्चिमी संगीत के महारथी थे लेकिन तब तक आधी सदी की अपनी संगीत यात्रा में उन्होंने कई हिंदी फिल्मों के लिए गाने कम्पोज़ किये और बैकग्राउंड म्यूजिक भी बनाया। हिंदी फिल्मी संगीत के प्रेमी मंथन, भूमिका, तमस, जुनून और टीवी सीरियल भारत एक खोज के लिए अच्छी तरह जानते हैं। चाहे जुनून का 'घिर आई काली घटा मतवाली' हो या मंथन का 'मेरो गाम कथा पारे', मंडी का मिनिमलिस्ट म्यूजिक और उसमें भी जिस तरह 'चुभती है ये तो निगोड़ी' को विशिष्ट बनाता हो, ये सभी गाने वनराज भाटिया के जादुई स्पर्श से अमर हो चुके हैं। 

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वनराज भाटिया ने अपने जीवन आखिरी वर्षों में हिंदी फिल्मों के गानों को जैसा पाया, उसका दुःख इस मुलाकात में मुझे याद रह गया। 'मेलॉडी तो अब रह ही नहीं गयी है बस नॉइज़ है। शब्द भी क्या कचरे-कचरे लिखे जा रहे हैं - गंदी गंदी बात ... यह भी कोई गाना है ?" कहते हुए उनके चेहरे पर गुस्सा साफ़ देखा जा सकता था।   

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अच्छे बुरे के सौंदर्यबोधात्मक भेद और विवाद में न जाते हुए यह मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि हिंदी फिल्मों का एक ऐसा लंबा दौर इतिहास में दर्ज हो चुका है जहां फिल्म की सिचुएशन के साथ न्याय करनेवाले सैकड़ों गीत फिल्मों से स्वतंत्र भी अपनी अस्मिता स्थापित कर चुके हैं और वे जितने पुराने होते जाते हैं, उतने ही दिल के करीब आते जा रहे हैं। हमारे समय में तीन पीढ़ियों की ये साझा स्मृतियाँ एक अदृश्य बंधन तैयार कर चुकी हैं।  

कहते हैं कि फिल्मी गाने आधुनिक जीवन का लोक संगीत हैं। बीसवीं सदी की एक अद्भुत ईजाद यानी फिल्मों ने हमें फिल्मी गाने दिये हैं। इन फिल्मी गानों ने हमारे दैनंदिन जीवन में काम लाए जाने वाले शब्द दिए हैं। भावनाओं को उजागर करने के लिए सरल वाक्य  दिए हैं। शक्ति और सत्ता से टकराने का हौसला दिया है और कठिनाइयों का हँसकर सामना करना  सिखाया। इनका वुजूद बदलते हुए समाज के साथ ही रूप लेता रहा है और अब भी ले रहा है। कह सकते हैं कि जो काम लोकगीत-मुहावरे और लोकोक्तियां किया करती थीं, वही काम ये गाने पिछले लगभग नब्बे  सालों से कर रहे हैं। 

किसी भी समाज में नब्बे साल कोई बड़ा अरसा नहीं होते, फिर हमारे जैसे प्राचीन समाज में इतने थोड़े से वर्षों की गिनती ही क्या है? लेकिन कभी बैठ कर सोचिए कि कैसा जादू है इन फिल्मी गानों में, तो सचमुच हैरत होती है। मधुर संगीत और फिल्म में प्लेसिंग के बाद तो इनके जादू का असर दिखता ही है- इसके बगैर भी इनका स्वतंत्र व्यक्तित्व नकारा नहीं जा सकता। खासतौर पर जिन्हें हम ‘पुराने गाने’ कहते हैं, वो पुराने होकर भी पुराने नहीं पड़ते। इन गानों में जो शायरी है, वह अपने समाज के हर दुख-दर्द, शिकायत और प्रतिरोध को स्वर देती है। यह शायरी सताने वालों का पक्ष नहीं लेती, इसमें सताये हुए लोगों की भरपूर तरफदारी है। इसमें शोख, निडर, बेबाक मोहब्बत का इजहार है, असहाय और बेसहारा लोगों की तकलीफें और उमंगें हैं, मेहनतकश लोगों के ख्‍वाब और उम्मीदें हैं। बच्चों की लोरिया हैं, जमाने से टकराने और कुरीतियों को चुनौती देने की बाते हैं, सकारात्मक मूल्यों की पक्षधरता है, परम्परा और यथास्थिति की ग़ुलामी का प्रतिकार है, प्रकृति और मनुष्य के संबंधों का बेलगाम वर्णन है, सेल्फरेस्पेक्ट और व्यक्तिपरकता की गूंज है। ये शायरी इंसान में जीने के हौसले को तो दो कदम आगे बढ़ाती ही है, इंसान से इंसान के रिश्ते और भरोसे को मज़बूत करती है।

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रोमांटिक से लेकर यथार्थपरक गीतों की इंद्रधनुषी छटा को देखते हुए हिंदी के सुविख्यात कवि और अनुवादक विष्णु खरे के शब्दों में हम कहेंगे कि ऐसा कोई विषय, ऐसा कोई भाव, ऐसी कोई जीवन स्थिति नहीं है, जिस पर गाने न लिखे गये हों। यहां कारों और बंगलों वालों के गाने हैं तो रिक्शों और झोपड़ियों के गाने भी हैं। बाँझ और विधवाओं  के गाने हैं तो 10 बच्चेवालियों और सुहागिनों के भी हैं। बूटपॉलिश और चम्पीवलों के गाने हैं तो यहाँ पतंग और चक्कूछुरियां तेज़ कराने के गाने भी हैं। ट्रक वालों ने जब 'मैं निकला गड्डी लेकर' सुना तो उन्हें लगा किसी ने उनके ही दिल की बात कह दी। ग़रज़ यह कि कोई ऐसा पेशा, भाव या मनः स्थिति नहीं है जिससे जुड़े फ़िल्मी गाने न हों। और यह भी कि अगर इस दौर के समूचे भारतीय समाज को सिरे से नष्ट कर दिया जाए, तो भी इन गीतों के माध्यम से उस काल को पुनर्निर्मित (reconstruct) किया जा सकता है कि वह कैसा समाज था, लोगों के सुख-दुख, सपने, संस्कृति, परम्परा और सामाजिक-आर्थिक रिश्ते कैसे थे।

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यहां अंग्रेजी वर्णक्रम में उन चुनिंदा गीतकारों के नाम याद करना ठीक रहेगा जिन्होंने हिंदी फिल्मों को यादगार गीत दिए। अंजुम पीलीभीती, आरज़ू लखनवी, आनंद बख्शी, अंजान, असद भोपाली, भारत व्यास, डीएन मधोक, गोपाल सिंह नेपाली, गोपालदास नीरज, गुलज़ार, गुलशन बावरा, हसरत जयपुरी, इंदीवर, जानिसार अख्तर, जावेद अख्तर, ख़ुमार बाराबंकवी, किदार शर्मा, कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, नूर लखनवी, नक्शब, पी एल संतोषी,पंडित सुदर्शन, पंडित भूषण, पंडित इंद्र, प्रेम धवन, प्रदीप, क़मर जलालाबादी, राजा मेहदी अली खान, राजिंदर कृष्ण, रविंद्र जैन, साहिर लुधियानवी, शकील बदायूँनी, शैलेन्द्र, एसएच बिहारी, तनवीर नक़वी, योगेश और जिया सरहदी। इनमें से गुलज़ार और जावेद अख्तर आज युवाओं के बीच भी खासे लोकप्रिय हैं जबकि सदी के करवट लेने के बाद युवाओं की बदलती आकांक्षाओं को शब्दों में पिरो रहे हैं अमिताभ भट्टाचार्य, इरशाद कामिल, प्रसून जोशी, स्वानंद किरकिरे, कौसर मुनीर,  राहत इंदौरी, सईद कादरी, सागर जेएनयू, और मनोज मुन्तशिर भी। 

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यहां जो नाम दर्ज किये गए हैं उनकी रचनात्मक और पेशेवराना यात्राएं खंगालें तो कई दिलचस्प बातें सामने आएंगी और जिनसे हिंदी कविता और उर्दू शायरी की लोकप्रिय गीतों पर छाप का एक सिलसिलेवार अध्ययन किया जा सकता है जबकि रिकॉर्डिंग की नई तकनीक और फिल्मों के कॉरपोरेटीकरण ने शब्दों और साहित्यिक संकेतों को कितना स्थूल और सतही बनाया है इस बात को गीतों की अल्पकालिक उपस्थिति के साथ जोड़ कर समझा जा सकता है। 

बहरहाल इस विषय में उतरना मूल विषय से हटने और विवाद को आमंत्रित करेगा जो किसी अन्य लेख में स्वतंत्र रूप से करूँगा।   


आज फिल्मी गीतों में मौजूद कविता या कहें शायरी की पड़ताल करते हुए मेरे सामने कई मंज़र उभरते हैं, कई बातें ताज़ा हो जाती हैं। मेरे घर में जो रेडियो था, उस पर सुबह से ही रेडियो सीलोन और विविध भारती पर गाने खनक उठते थे। मेरी दादी को पुराने गानों का शौक़ था और पिता भी कला-साहित्य-संगीत के कम प्रेमी नहीं थे। सुबह सवा सात से साढ़े सात बजे तक रेडियो सीलोन से ताज़ा रिलीज़ हुई फिल्मों के गाने बजते थे और साढ़े सात से आठ तक पुराने गाने बजते थे। इस कार्यक्रम का समापन नियम से सिंगिंग स्टार कुंदन लाल सहगल के गाये किसी गीत से होता था। यानी आप सहगल साहब की आवाज़ सुनते ही अपनी घड़ी मिला सकते थे। ‘चाह बरबाद करेगी हमें मालूम न था’, ‘दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं’, ‘एक बंगला बने न्यारा’ और ‘सो जा राजकुमारी सो जा’ जैसे गाने आज भी यादों में इस तरह ताज़ा हैं कि जैसे कल की बात हो। गानेवालों की आवाज़ें और संगीत का जादू हमें सम्मोहित कर लिया करता था। इस सबके बीच एक और दिलचस्प बात ये होती थी कि शब्दों का एक लयात्मक संसार हमारे जीवन में प्रवेश कर जाया करता था। हालांकि ज्यादातर प्रेम और विरह के गीत हमारी ज़ि‍न्‍दगी को उतना प्रभावित नहीं करते थे, जितना उन्हें प्रभावित करते होंगे, जिन्होंने प्रेम और विरह के मर्म को समझा होगा। हम बच्चे थे और ‘मार कटारी मर जाना रे अंखियां किसी से मिलाना ना’, या ‘आवाज़ दे कहां है- दुनिया मेरी जवां है’ की गहराई तक नहीं पहुंच सकते थे।


यादों का सिलसिला आगे बढ़ता है और उनमें एक दूसरे को काटते और एक दूसरे को अपदस्थ करने की कोशिश में लगे गाने जुड़ते हैं। ‘वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां’, ‘गोरे रंग पे न इतना गुमान कर गोरा रंग दो दिन में ढल जाएगा’, ‘दिल को देखो- चेहरा ना देखो चेहरे ने लाखों को लूटा’, ‘दो जासूस करें महसूस कि दुनिया बड़ी खराब है’, ‘मेरा जीवन कोरा काग़ज़ कोरा ही रह गया’, ‘घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं मैं’, ‘न मुंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो, ग़मों को दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो’, ‘बाज़ार में गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं’, ‘कुछ लोग जो ज्यादा जानते हैं इंसान को कम पहचानते हैं’, ‘एक अकेला थक जाएगा मिलकर बोझ उठाना’, ‘ग़म और खुशी में फर्क न महसूस हो जहां- मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया’ और इस तरह की सैकड़ों लाइनें हमारी भाषा और साहित्य शिक्षण का हिस्सा बनती गयीं। ऐसा नहीं था कि हम इन पंक्तियों को सायास अपनी ज़िंदगी में उतार  रहे थे क्योंकि हमारे लिए नियत स्कूली पाठ्यक्रम था और हमारे शिक्षक-अभिभावक निश्चिंत थे कि हम नीति और बोध की अच्छी-अच्छी बातें पढ़ कर सभ्य-सुसंस्कृत नागरिक बन रहे हैं। हालांकि सच्चाई ये थी कि हमें पढ़ायी-बतायी जाने वाली बातों में एक बासीपन था और एक किस्म की जड़ता, जो हमें पूरी तरह आश्वस्त नहीं कर पाती थी कि हम अपने समय की फ़रेबी हक़ीक़तों को कभी पकड़ पाएंगे। शायद इसी खालीपन और बेबसी में हर बार एक फिल्मी गाना हमारे कानों से होता दिल में उतरता था और हमें एक साथी मिल जाता था।

ग़ौर कीजिए कि जब बात समझी-समझी सी लग रही हो लेकिन उसे कहने का ढंग न आ रहा हो तो चंद आसान, आम-फ़हम, रोज़ इस्तेमाल में आने वाले अल्फ़ाज़ के बेहद सरल ताने-बाने में उसे कसकर पेश कर दिया जाए, तो आंखें कैसी खुशी से चमक उठती हैं? ‘चांदी की दीवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया’, ‘प्यार किया कोई चोरी नहीं की’, ‘हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा’ जैसे गानों ने हमें ये सलीक़ा सिखाया है कि हम ज़ि‍न्दगी को काले-सफेद रंगों में देखना बंद कर दें और उन रंगों को भी पहचानें जो इन दो रंगों के बीच हमेशा मौजूद रहते हैं।

इन फुटकर विचारों और स्मृतियों की खंगाल के पीछे मेरे उस पेशे का भी हाथ है, जिसे मैंने एक दौर में अपने शौक़ और व्यावहारिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए अपनाया। तब देश में एफ़एम रेडियो एक आंधी की तरह आया जहां मैंने बतौर रेडियो प्रेज़ेंटेटर दस से ज़्यादा वर्षों तक सक्रिय रूप से प्रोग्राम पेश किये। रेडियो प्रज़ेंटर जिसे फैशन और सुविधा के लिए रेडियो जॉकी कहा जाता है। प्रोग्राम में आने वाले पत्रों और फोन कॉल्स से मुझे हर शो में ये एहसास होता कि ये फ़िल्मी गाने सिर्फ मेरे लिए नहीं बल्कि करोड़ों श्रोताओं के लिए एक ऐसा सरमाया हैं जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आठवें दशक में ग़जलों और गैर फिल्मी गानों ने भी इस श्रव्य संसार में एक नया आयाम जोड़ा जो क्रम आज ढलता चला जाता है। यहां जगजीत सिंह और मन्ना डे के अलावा बेगम अख्तर का नाम उन लोगों की सूची में सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए, जिन्होंने समय की धड़कनों से गूंजती शायरी से हमारा परिचय कराया।

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एक शो में एक दिन किसी कॉलर को लाइन पर लिया, तो उसने बताया कि उसे ‘जाने वालों ज़रा मुड़ के देखो मुझे, एक इंसान हूं मैं तुम्हारी तरह...’ गाने में जब ये लाइन आती है  ‘फिर रहा हूं भटकता मैं यहां से वहां’ और ‘परेशान हूं मैं तुम्हारी तरह’... तो लगता है मेरे ही लिए लिखी गयी है। उसने कहा कि उसने ऐसे बहुत से गानों को गाने की तरह नहीं बल्कि एक जीवन के दर्शन की तरह समझा है। उसने उदाहरण के लिए कुछ गीतों को इस तरह मेरे सामने रखा - ‘तूफान तो आना है, आकर चले जाना है, बादल है ये कुछ पल का, छाकर ढल जाना है... परछाइयां रह जातीं, रह जाती निशानी है... ज़ि‍न्‍दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है’... ‘हो गयी है किसी से जो अनबन, थाम ले दूसरा कोई दामन, ज़ि‍न्‍दगानी की राहें अजब हैं हो अकेला तो लाखों हैं दुश्मन’... ‘इतनी सी बात ना समझा ज़माना, आदमी जो चलता रहे तो मिल जाए हर खज़ाना’... ‘कभी मैं न सोया, कहीं मुझसे खोया, हुआ सुख मेरा ऐसे, पता नाम लिखकर कहीं यूं ही रखकर भूले कोई कैसे, अजब दुख भरी है ये बेबसी बेबसी’... ‘जाकर कहीं खो जाऊं मैं, नींद आये और सो जाऊं मैं, दुनिया मुझे ढूंढे मगर मेरा निशां कोई न हो’... ‘मिलकर रोएं फरियाद करें उन बीते दिनों की याद करें, ऐ काश कहीं मिल जाए कोई वो मीत पुराना बचपन का’... ये वो लाइनें हैं जो उसे एक तरफ तो अक्सर याद आती हैं और बेचैन कर जाती हैं दूसरी तरफ इन लाइनों में बड़े बड़े सिद्धांतों, प्रेरक कथाओं और नीतिवाक्यों की शक्ति है। और हो भी क्यों न ? इन गीतों के रचयिता जीवन की गहराइयों में डूबे हुए लोग तो थे और साहित्य रचना की ज़रूरी कल्पनाशीलता और सर्जक की ज़िम्मेदारी से बखूबी वाकिफ थे। लोकप्रिय संगीत और गंभीर साहित्य सृजन उनसे बराबर तवज्जो माँगता रहा। 

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जिस कॉलर का मैंने यहां ज़िक्र किया वो एक कॉल सेंटर में सीईओ था और कोई तीन लाख रुपये प्रति माह उसकी सैलरी थी। बातचीत के दौरान वह सहज रूप से किसी फिल्मी गाने की लाइन का सहारा लेकर अपनी बात कहता। इस बार अपने बचपन और बीते दिनों की यादों की अक्कासी में उसने जो लाइनें कहीं वो शैलेंन्द्र की थीं- ‘मैं अकेला तो न था, थे मेरे साथी कई, एक आंधी सी उठी, जो भी था ले के गई, आज मैं ढूंढू कहां खो गए जाने किधर, बीते हुए दिन वो हाए प्यारे पल छिन।‘

मैं हैरान हूं और सोचने को मजबूर कि फिल्मी गानों को महज़ मनोरंजन का सामान समझा जाए या उन्हें रोशनी का एक ज़रिया भी, जो करोड़ों अनाम लोगों को हर पल सहारा देते हैं, उनकी आवाज़ बनते हैं। क्या इन्हें गंभीर विमर्श और विचार योग्य विषय नहीं बनाया जाना चाहिए?

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